राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का जीवन परिचय

Jan 25, 2023 - 08:24
Jan 23, 2023 - 11:07
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राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का जीवन परिचय
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का जीवन परिचय

अजीत डोभाल पीएम नरेंद्र मोदी के ‘5 वें और वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार’ (NSA) है। अजीत डोभाल को पहली बार 30 मई, 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के ‘5 वें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार’ के रूप में नियुक्त किया। इसके साथ-साथ प्रधानमंत्री मोदी के मंत्रिमंडल में ‘कैबिनेट मंत्री’ का दर्जा भी इनको प्रदान किया गया है।

भारत की बड़ी-बड़ी सुरक्षा एजेंसिया इनके निर्देशानुसार ही काम करती है तथा डोभाल राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित मुद्दों पर भारत सरकार को सलाह देते है।

अजीत डोभाल को ’द जेम्स बॉन्ड ऑफ इंडिया’ के उपनाम से संबोधित किया जाता है। इन्होंने 2004 से 2005 तक ’इंटेलिजेंस ब्यूरो’ (आईबी) के निदेशक के रूप में कार्य किया है। यह केरल कैडर के एक सेवानिवृत्त भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी और एक पूर्व भारतीय खुफिया और कानून प्रवर्तन अधिकारी हैं।

अजीत डोभाल का जीवन परिचय

अजीत डोभाल का जन्म 20 जनवरी 1945 को गढ़वाली परिवार में पौड़ी गढ़वाल के घिरी बनेलस्युं गांव में हुआ था। इनके पिता गुणानद डोभाल थे, जो भारतीय सेना में अधिकारी थे। इसी वजह से इन्होंने अपनी पढ़ाई मिलिट्री स्कूल में की। अजीत डोभाल के मन में देशभक्ति की भावना बाल्यकाल से थी।

अजीत डोभाल ने वर्ष 1972 में अनु डोभाल के साथ विवाह किया। इनके दो बेटे है – शौर्य डोभाल और विवेक डोभाल।

अजीत डोभाल अपनी प्रशसंनीय सेवा के लिए पुलिस पदक प्राप्त करने वाले सबसे कम आयु के पुलिस अधिकारी है।

इनको भारत का ’सर्वोच्च वीरता पुरस्कार’ और ’कीर्ति चक्र’ पुरस्कार मिला। वह ’कीर्ति चक्र’ (सैन्य सम्मान) (1998) पाने वाले पहले पुलिस अधिकारी है। सन् 2014 में डोभला इराक के तिकरित के एक अस्तपाल में फंसी हुई 46 भारतीय नर्सों को सुरक्षित वापस भारत लेकर आये थे।

धारा 370 वाले मुद्दे को सफलतापूर्वक अंजाम देने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहीं, इसी कारण इन्हें ‘जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने का मास्टर माइंड’ कहा जाता है। इन्होंने कई राष्ट्रीय रक्षा मिशनों में अपना अतुलनीय योगदान दिया है तथा विभिन्न पदों पर रहते हुए 40 वर्षों तक इन्होंने देश की सेवा की है।

अजीत डोभाल की शिक्षा

अजीत डोभाल ने अपनी स्कूली शिक्षा ‘किंग जॉर्ज के रॉयल इंडियन मिलिट्री स्कूल’, अजमेर (राजस्थान) से प्राप्त की। 1967 में आगरा विश्वविद्यालय से इन्होंने अर्थशास्त्र में स्नातक और मास्टर डिग्री पूरी की। इसके बाद 1968 में डोभाल ने आईपीएस एग्जाम की तैयारी की और कड़ी मेहनत से एग्जाम को पास कर लिया तथा पहली बार में ही ‘आईपीएस केरल कैडर’ के रूप में नियुक्त हुए।

सन् 2017 में अजीत डोभाल को आगरा विश्वविद्यालय से विज्ञान में ‘डॉक्टरेट’ की उपाधि उन्हें सम्मान के रूप में दी गयी। उन्होंने मई, 2018 में कुमाऊं विश्वविद्यालय से साहित्य में ‘डॉक्टरेट’ की प्रसिद्ध उपाधि हासिल की। नवंबर 2018 में भी इनको एमिटी विश्वविद्यालय के द्वारा दर्शनशास्त्र में ‘डॉक्टरेट’ की उपाधि प्रदान की गयी।

अजीत डोभाल का करियर

आईपीएस अधिकारी के रूप में कार्यरत

अजीत डोभाल के करियर की शुरूआत 1968 ई. में केरल के एक आईपीएस अधिकारी के रूप में हुई। इसके पश्चात् पंजाब और मिजोरम में आतंकवाद विरोधी अभियान में इन्होंने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। इसके कुछ समय बाद ही उन्हें ’इंडियन जेम्स बॉन्ड’ की उपाधि से अलकृंत कर दिया गया।

अजीत डोभाल ने 1 जनवरी से 9 जनवरी 1972 तक थालास्सेरी में काम किया तथा क्षेत्र में कानून व्यवस्था को व्यवस्थित ढंग से चलाने के लिए तत्कालीन गृह मंत्री के द्वारा इनको नियुक्त किया गया। पांच महीने तक उन्होंने थालास्सेरी में काम किया और बाद में वह केंद्रीय सेवा में सम्मलित हो गए। 28 दिसंबर, 1971 को जब थालास्सेरी में दंगा भड़क गया, तब वहां आरएसएस पर मुसलमानों और मस्जिदों को निशाना बनाने का आरोप लगाया गया।

1999 में अजीत डोभाल उन तीन वार्ताकारों में भी सम्मिलित थे, जिन्होंने अफगानिस्तान के कंधार में IC-814 यात्रियों की रिहाई के लिए हुई बातचीत की थी। 1971 से 1999 तक इंडियन एयरलाइंस के विमान के 15 अपहरणों को समाप्त करने में भी इन्होंने भूमिका निभाई। भारत द्वारा जब इन तीन कार्यकर्ताओं (अहमद ओमर सईद शेख, मुश्ताक अहमद जरगर और मौलाना मसूद अजहर) को रिहा किया गया, उसके बाद ही बंधक संकट समाप्त हुआ।

पाकिस्तान में अंडरकवर ऑपरेटिव

अजीत डोभाल ने पाकिस्तान में एक अंडरकवर ऑपरेटिव के रूप में सक्रिय उग्रवादी समूहों खुफिया जानकारी जुटाने के लिए सात साल बिताए। उन्होंने पाकिस्तान में स्वयं को एक मुस्लिम के रूप में प्रस्तुत किया तथा पाकिस्तान में रहते समय उन्होंने भारत को महत्त्वपूर्ण जानकारी भी भेजी थी। ‘’गुप्त एजेंट’ के रूप में एक वर्ष कार्य करने के बाद उन्होंने छह वर्ष तक इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग में अपनी कार्यप्रणाली निभाई थी। 

ऑपरेशन ब्लू स्टार

अजीत डोभाल ने 1984 में खालिस्तानी उग्रवाद को रोकने के लिए ’ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के लिए खुफिया जानकारी जुटाने में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 1990 में वह कश्मीर गए और कट्टर उग्रवादियों और सैनिकों को आतंकवाद विरोधी बनने के लिए सहमत किया, जिससे जम्मू-कश्मीर के चुनाव का मार्ग प्रशस्त हो गया था।

डोभाल जी ने अपने करियर में अधिकतर इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के साथ-साथ एक सक्रिय फील्ड इंटेलिजेंस ऑफिसर के रूप में काम किया। उनकी बहादुरी के कारण उन्हें कई प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिले। उन्होंने आतंकवाद के विरुद्ध कार्य किया था तथा महत्त्वपूर्ण अभियानों में भाग लिया था, इसी कारण उन्हें सम्मानित किया गया था।

जब एक आतंकवादी संगठन ‘MALF’ (मिजोरम आर्म लेफ्ट फ्रंट) भारत से अलग अपना देश बनाना चाहता थां। उस दौरान मिजोरम की खराब स्थिति को मायने रखते हुए इस समस्या को दूर करने के लिए डोभाल जी स्वयं वहां गये और उन्होंने MALF के मुख्य कमांडर लाल डेगा से मुलाकात की तथा उनके सात कमांडरों में से छह पर जीत हासिल की। इसी कारण MALF के मुख्य कमांडर की स्थिति कमजोर हो गयी और उसने आत्मसमर्पण कर दिया।

डोभाल जी बर्मा के अराकान और चीनी क्षेत्र के अंदर कई वर्षों तक भूमिगत रहे। वहां से वे सिक्किम गए थे और सिक्किम राज्य को भारत में विलय करने में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वह ‘MAC’ (मल्टी-एजेंसी सर्कल) और ‘JTFI’ (इंटेलिजेंस पर ज्वाइंट टास्क फोर्स) के संस्थापक अध्यक्ष भी थे।

अजीत डोभाल ने ’खालिस्तान लिबरेशन कोर्स’ द्वारा गिरफ्तार किये गये रोमानियाई राजनयिक लिविउ राडू को बचाया। उन्होंने पंजाब में ‘ऑपरेशन ब्लैक थंडर’ में भी हिस्सा लिया था।

अजीत डोभाल सेवानिवृत्ति होने के बाद

जनवरी 2005 में अजीत डोभाल ‘इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी)’ के निदेशक के रूप में सेवानिवृत्त हुए। दिसंबर 2009 में वह ‘विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन’ के संस्थापक निदेशक बने। डोभाल जी ने प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं के लिए सक्रिय रूप से संपादकीय अंश लिखे हैं।

भारत में राष्ट्रीय सुरक्षा, इसकी चुनौतियों और विदेश नीतियों पर भारत और विदेशों में सरकारी और गैर-सरकारी संस्थानों, थिंक टैंक आदि में व्याख्यान दिए हैं। 2009 और 2011 में अजीत डोभाल ने ’भारतीय काला धन विदेशों में गुप्त बैंकों और टैक्स हैवन्स’ पर दो रिपोर्टें सह-लिखी है।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में नियुक्ति

अजीत डोभाल की सेवानिवृत्ति के पश्चात, 30 मई 2014 को प्रधामंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनको भारत के ‘पांचवें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार’ के रूप में नियुक्त किया गया था।

उन्होंने जुलाई 2014 को इराक में तिकरित के एक अस्पताल में फंसी 46 भारतीय नर्सों को सुरक्षित वापस भारत पहुँचाया। 25 जून, 2014 को अजीत डोभाल एक शीर्ष-गुप्त मिशन के लिए इराक रवाना हुए तथा उन्होंने इराक सरकार के साथ उच्च स्तरीय बैठकें की। 5 जुलाई 2014 को नर्सों को भारत वापस लाया गया।

इसके बाद डोभाल ने सेना प्रमुख जनरल दलबीर सिंह सुहाग के साथ म्यांमार से बाहर चल रहे नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड के उग्रवादियों के विरुद्ध म्यांमार में सैन्य अभियान को अपना नेतृत्व भी प्रदान किया।

पाकिस्तान के हवाई हमले के पीछे दिमाग

अजीत डोभाल पाकिस्तान के संबंध में भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा नीति में सैद्धांतिक बदलाव के लिए लोकप्रिय है। भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा नीति रक्षात्मक से रक्षात्मक आक्रामक से दोहरी निचोड़ रणनीति में परिवर्तन हो गईं। रिपोर्टों के अनुसार यह माना जाता है कि पाकिस्तान नियंत्रित कश्मीर में 2016 के भारतीय हमले उनके दिमाग की ही उपज थे।

उन्होंने तत्कालीन विदेश सचिव एस जयशंकर और चीन में भारतीय राजदूत विजय केशव गोखले के साथ अपने राजनयिक संबंधों के माध्यम से डोकलाम गतिरोध को भी सुलझा दिया।

अजीत डोभाल को अक्टूबर 2018 में SPG (रणनीतिक नीति समूह) के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था।

अजीत डोभाल – भारत के नये राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (New National Security Advisor of India)

अजीत डोभाल को 3 जून, 2019 में पांच और वर्षों के लिए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार’ के रूप में फिर से नियुक्त किया गया। नरेंन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के दूसरे कार्यकाल में ‘कैबिनेट मंत्री’ का दर्जा दिया गया।

15 मई, 2020 को म्यांमार की सेना ने भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय 22 विद्रोहियों के एक समूह को एक विशेष विमान से भारत सरकार को सौंपा।

अजीत डोभाल को मिले पुरस्कार

अजीत डोभाल ने भारत देश में अनेक पदों पर अपनी प्रशंसनीय सेवाएँ प्रदान की। देश की राष्ट्रीय सुरक्षा में उनके अमूल्य योगदान के कारण उन्हें कई सर्वोच्च वीरता पुरस्कार भी मिले।

(1) अजीत डोभाल अपनी प्रशंसनीय सेवा के लिए ‘पुलिस पदक पाने वाले सबसे कम उम्र के पुलिस अधिकारी’ थे। पुलिस में अपनी सेवा के 6 साल पूरे करने के बाद उन्हें यह पुरस्कार मिला।

(2) अजीत डोभाल को ‘राष्ट्रपति पुलिस पदक’ से सम्मानित किया गया। यह पदक या तो वीरता या राष्ट्र की विशिष्ट सेवा के लिए व्यक्ति को दिया जाता है।

(3) 1998 में उनको सर्वोच्च वीरता पुरस्कार ‘कीर्ति चक्र’ से सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार प्राप्त करने वाले वे ‘पहले पुलिस अधिकारी’ थे, जो पहले सैन्य सम्मान के रूप में दिया जाता है।

अजीत डोभाल ने अपने सम्पूर्ण जीवनकाल को देश की आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए न्यौछावर कर दिया। उनकी मेहनत और बुद्धिमता के कारण उन्हें ’जिओपोलिटिक्स का ग्रैंड मास्टर’ भी कहते हैं। देश में जब CAA विरोधी आन्दोलन और किसान आंदोलन हुए, उस समय भी उन्होंने बङी सतर्कता से आंतरिक सुरक्षा करके सराहनीय कार्य किया था। उनके साहसिक कार्यों और प्रशंसनीय योगदान के कारण उनकी ख्याति पूरे भारत देश में छाई हुई है।

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